Thursday, April 23, 2020

कविता


                  लाकडाउन मे अपनी दिनचर्या


               

उठ सुबह मुंह धो कर दूध लेकर आऊ
 आकर के गरमा गरम चाय  बना कर लाऊं

 फिर बाहर निकल कर देखो बार बार
ठेले वाले से सब्जी को लेकर  आऊ

नहा कर पूजा पाठ करूं भगवान की
 जाकर फिर किचन में हाथ बटा कर आऊ

 फिर मिले गरमा गरम रोटी की थाली
 पहले भोग भगवान को लगाकर फिर पाऊं

 थोड़ी देर लेकर झपकी  चार बजे देखूं टीवी
फिर चाय बना श्रीमति को देकर आऊ

 रोज शाम को कुकर के लगने से पहले
दाल  और चावल बीन कर देकर आऊ

फिर मिले खाने को रात का खाना मुझे
रामायण महाभारत डीएनए देखकर सोने जाऊं

 बस यही है श्रीकांत  दिनचर्या लाकडाउन की
 श्रीमति की हाजिरी  बजा बजाकर सुख पाऊ

मनोज दुबे श्रीकांत

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