Wednesday, April 22, 2020

लघु कथा

                           पगार
                 

         
                     

               

   बाजार शहर और  काम बंद हुए आज कई दिन बीत चुके थे लाख डाउन का आज उनतीसवा  दिन था। रामकिशन बरामदे में चिंतित बैठा सोच रहा था। कुछ ही दिन के पैसे से बचे हैं, आगे यदि कोरोना महामारी और लाकडाउन और बड़ा तो काम भी नहीं होगा और बिना काम से मालिक  से पैसे किस प्रकार मांगूंगा समझ में नहीं आता, इतने मे पत्नी की आवाज आई  सुनो जी दो-चार दिन का राशन शेष है, कुछ राशन  ले सब्जी भाजी ले आते और आटा भी खत्म हो चुका है। आगे के दिन पता नहीं कैसे निकलेंगे भागवती के इन शब्दों ने रामकिशन की चिंता और बढ़ा दी।



                              रामकिशन उदास सा बैठा सोच रहा था। काश लाक डाउन हटे तो मालिक से बात  करू  कुछ दिन पहले ही देश के प्रधान ने तो कहा था।कि कोई भी कर्म चारी की पगार  कोई नही काटेगाऔर ना ही कोई कर्मचारी काम से निकाला जाएगा, परंतु सोचने में आता है, कि पिछले महीने मुनीम जी ने गत महीने का   पैसा  काटकर पगार दी थी  तो फिर उनसे मैं किस प्रकार से महीने भर की पगार मांगू सोचने में और बोलने में संकोच होता है।

भगवती ऐसा नहीं हो सकता,  बिना काम के मालिक के सामने हाथ पसारना उचित नहीं समझता,नहीं नहीं नहीं मैं नहीं जाऊंगा मालिक से किसी भी प्रकार से मदद कीबाबात कहने या पगार की बात कहने
                       तो फिर क्या परिवार और बच्चों को भूखे रखोगे या खुद भी भूखे रहोगे क्या विगत वर्षों में तुम अपने मालिक का इतना विश्वास भी नहीं जीत पाए कि वह मुसीबत के समय तुम्हारी मदद कर सके  नहीं नहीं  भागवती ऐसी कोई बात नहीं फिर भी यदि तुम कहती हो तो मैं जाकर बात करने की कोशिश करता हूं
मालिक  रामकिशन से - - - कहो रामकिशन कैसे आना हुआ जी जी मालिक बस मिलने चला आया कुछ काम-वाम हो तो बता दीजिए कर भी दूंगा और  बदले मे कुछ पैसे भी मिल जाते तो मालिक इन तंग दिनो मे घर का खर्च भी निकल जाता नहीं-नहीं रामकिशन तुम्हें पता नहीं है कोरोना के चलते अभी सभी को घर पर रहना है सब कुछ बंद है और फिर क्या तुम्हें प्रधान जी का आदेश पता नहीं है  रामकिशन मालिक से जी  पता तो है रामकिशन के माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थी वह अपने गमछे से पहुंचकर संकोच बस खड़ा रहा कुछ ना बोल पाया

रामकिशन के संकोच को देखते हुए रामकिशन मुझे मालूम है आप कितने आत्म स्वाभिमानी हो मैं यह पैसे तुम्हें मदद के लिए दे रहा  हूं रामकिशन यह पिछले महीने की पगार है  फ्री में ना  समझना और फिर रही बात बिना काम के पैसे की तो मुनीम जी किश्त के रूप मे यह अतिरिक्त पगार थोड़ा थोड़ा करके काट लेना रख लो  काम आएंगे  रामकिशन इस लाकडाउन के दोरान तुम्हारे परिवार के इन पैसो की आवश्यकता है तुम्हें , रामकिशन  संकोच वशअपने पैसे लेकर वहां से मालिक को प्रणाम करके निकल गया और रास्ते मे वह सोच रहा था कि मैं खामखा मालिक के प्रति संदेह रख रहा था मुनीमजी की बातों में आकर वास्तव में मालिक मालिक है  वह हम सब की आवश्यकता को समझते है वह चाहे मेरी  हो या मुनीम जी की

                                     मनोज दुबे श्रीकांत

   



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