थमा रहे हो डंडे क्यो कलम की जगह हाथ में
रंग स्याही का बदल रहे हो क्यों रक्त में
देश के छात्रों को पढ़कर गढ़ने दो भविष्य
राष्ट्र को ढकेल रहे हो क्यो सब गर्त में
दाल गलाने को अपनी वोट बैंक की
करा रहे हो दंगे क्यो शिक्षक संस्थान में
जेएनयू और जामिया के साथ देश झुलसा ल
गा रहे हो आग क्यो देश की फिजां मे
खुली हवा में ले रहे हो सांस आजाद की
आजादी छीन कर लेने की चाह क्यो देश में
इरादे बदल डालो अपनी राजनीति के श्रीकांत
मिटा रहे हो क्यो अपने आपको इतिहास मे
मनोज दुबे श्रीकांत
No comments:
Post a Comment