Friday, January 3, 2020

कविता

मोबाइल की पुनर विचार याचिका 

हमारा मोबाइल ने हमारे निर्णय
 पर पुनर याचिका दायर की
उसमे उसने अपनी बात कुछ
इस प्रकार की कहने लगा
 भैया आजकल तुम मुझे घर
 से ले जाकर डिब्बे मे बंद
कर देते हो मेरा दम ही उस डिबबै
 मे घोट देते हो मेरे जैसे कई
 मोबाइल उस डिब्बे मे पडे रहते हैं
हम अपना अपना दुखड़ा
ऐक दूसरे से कहते रहते हैं 
 बाहर कब निकलेंगे
इंतजार करते रहते है
एक एक कालखंड भैया
भारी पड़ता है और दिन कुछ
लोगो के मोबाइल की ही
घंटी सुन सुन कर के गुजरता है
आप तनक मेरी और मेरे जैसे
अन्य साथियों की दशा पर विचार
 कीजिये और मुझे इस
घुटन से मुक्त कीजिये
मैने कहा भैया मै तुम्हारी
लाचारी को समझता हूँ 
 मगर कुछू कर नही सकता हूँ 
मै भी बहुत ही मजबूर हू
मै तुम्हारी पुनर विचार याचिका
को उपर तक पहुँचा दूंगा
यदी हुआ तो तुम्हारे डिब्बे की
 घुटन से मुक्ती का जतन कर दूंगा
मगर हल मुझे कुछ नही दिखता है
तुम रहोगे यू ही बंद
डिब्बे मे ऐसा लगता है
क्योंकि पुनर्विचार याचिका
अपने देश मे रद्द होती है
जीत कैसे भी हो भैया
कानून की होती है
हम अगले दिनो मे तुम्हे
खुली हवा मे सास लेने के लिए 
 घर  पर ही छोड़ देगें 
और तुम्हे उस डिब्बे की
घुटन से मुक्त कर देंगे

मनोज दुबे श्रीकांत

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