बाते कुछ शेष है..........
बातें जो बातें जो नहीं कह सके हम
घर में जवान होती बेटी से
बराबरी से बैठते अपने बेटे से
बातें जो नहीं कह सके हम
आवारागर्दी करते मनचलों से
पढ़ने की स्कूल जाते बच्चों से
बातें जो नहीं कह सके हम
घर से भागी बेटी से
घर लाएं नवेली बहू से
बातें तो नहीं कह सकते हम
क्षेत्र के चुने नेता से
तरक्की को तरसते शहर से
बातें जो नहीं कह सकते हम
धर्म से जुड़ी परंपराओं से
अंधविश्वास से लड़ती कुरीतियों से
बातें जो नहीं कह सकते हम
भक्षक बने रक्षक से
परिवार तोड़ते मुखिया से
बाते जो नहीं कह सके हम
बड़ बु बड़े द्धिजीवियों से
पढ़कर पंडित बनते विद्वानों से
बातें जो नहीं कह सके हम
अपने विश्वसनीय इष्ट से
भक्ति के पथ वाले संत से
बाते जो नहीं कह सके हम
लोलुपता के शिकार अपनों से
परिवार की जड़ काटते भाइयों से
बातें जो नहीं कह सकें हम
अपनी कलम से अपनी भाषा के शब्दों से
बातें जो नहीं कह सके हम
प्रकृति से और उसकी आपदा से
बातें जो नहीं कह सके हम जिंदगी से
दिन बुलाई गई अंतिम सांसों से
बातें बहुत ही रह जाती है अधूरी
सोचते रह जाते हैं हम
और जिंदगी हो जाती है पूरी
बातें वो शेप चलती हैं हमारे बाद भी
जो हम कह नहीं पाए अपनो से
वो अमर रहती हैं जताने को उन्हें
जिन्हें हम बताना चाह कर भी नहीं बता पाए..................
मनोज दुबे श्रीकांत होशंगाबाद मप्र
No comments:
Post a Comment